Sunday, 20 January 2013

“आत्ममंथन”


नरसंहार बलात्कार व कई दुर्व्यवहार जब जब होते है इस धरा पर
सहम के कांपती है ये धरा और फिर इस तरह भूकंप आता है

भूख से मरता है जब बचपन
षड़यंत्र से लुटता है सुहागिनों का सिंदूर
शहनाईयों के घर में जब रुदाली काम आती है
तब हाय लगती है हाँ मनुवंश को इनकी
हाँ समंदर का ह्रदय भी छटपटाता है
और जलजले के साथ फिर सैलाब आता है

खत्म होती है जब रिश्तो की मर्यादा
सिमट के रह जाता है जब प्रेम दैहिक अवयवो के बीच
क्रूरता छल लेती है जब किसी के बालमन को
लालच कत्ल करती है जब ईमान का
आसमान भी जमीन को तब धिक्कारता है
एक-एक बादल हर किसान को दुत्कारता है
और अन्न का दाना भी फिर दुश्वार हो जाता है

भगवान के अस्तित्व पर जब प्रश्न उठते है
देशरक्षक ही देश को जब लुटते है
मानवता जब पैरों तले रौंदी जाती है
वहशियों के हाथों में इज्जत सौंप दी जाती है
भरे बाजार में तब नैतिकता नीलाम होती है
हमारी ललनाओं की कोख भी बदनाम होती है
बह निकलता है रोष गरम लावा के रूप में
और फिर इस तरह ज्वालामुखी विस्फोट होता है
बदलेंगे जब मानसिकता खत्म होगा क्लेश भी
इस तरह तो न रहेंगे मनुष्य के अवशेष भी
बदलना ही पड़ेगा अब हमें हमारी पीढ़ियों के वास्ते
बंद करने होंगे अब कुप्रवृतियो के रास्ते
वर्ना रामराज्य है कहाँ ये तो राक्षसों की लंका है
कर दो आत्ममंथनअब शुरू, क्योंकि मुझे महाप्रलय की आशंका हैI    

Saturday, 19 January 2013

"कल फिर आना तुम"


कल फिर आना तुम
उन्ही निगाहों को लेकर
जिन निगाहों से
तुमने मुझे पहली बार देखा
और
मुझ ही में खो गए
उसी पेड़ के तले आना
जहां बैठकर अक्सर
हम न जाने कितनी ही बाते किया करते थे
तुम्हे याद है वो
पेड़ के कोटर में रहने वाला
पक्षियों का जोड़ा
जो गवाह है
हमारी प्रीत के पहले चुम्बन का
याद है वो अधमुड़ी डाली
यूँ लगता था,मानो
कोई छुप छुप के हमें देख रहा हो
तुम तो शायद भूल जाओगे कभी मुझको
मगर वो सब,मुझे कभी नहीं भूलेंगे
उन्हें कह देना नहीं आएगी यहाँ पर
सयानी सी दिखने वाली वो नादान लड़की
कल फिर आना कॉलेज की लाइब्रेरी में
जहां मैं यूँही किताबे पलटते हुए
तुम्हारे आने का इन्तजार किया करती थी
तुम कुछ कंकरों में प्रेमपत्र लपेटकर
मेरी और फेंका करते थे
वो कंकर कल भी वही पड़े होंगे
वो कंकर,
शायद फिर ख़ूबसूरत शब्दों में सिमटना चाहे
तुम उन्हें उठाकर फ़ेंक देना पत्थरों के ढेर में
मैं नहीं चाहती की उनपर फिर
किसी मासूम को बर्बाद करने का इल्जाम लगे
कल फिर आना तुम
शहर की उस दूकान पर
जहां से खरीदकर तुमने मुझे पहला गुलाब दिया था
वहाँ फर्श पर बिखरी होगी कुछ सुखी पंखुड़िया
उन्हें छूना मत, उन्हें कुचलना अपने पैरों से
ताकि उन्हें भी अहसास हो
जमाने में
जमीन पर पड़ी हर चीज को
यूँ ही कुचला जाता है
किसी के अरमानो की तरह
कल फिर आना तुम
उसी नदी के किनारें
जहां तुम मुझे बस एक बार ले गए
और न जाने क्यूँ
मैं तुम्हे वहाँ ले जाने को कहती
तो तुम टाल देते
तुम डरते थे,शायद!
कहीं हम
नहीं तुम
बदनाम न हो जाओ
देखना वहाँ बैठी हर लड़की में
तुम्हे मैं नजर आउंगी
गुनगुनाती हुई
खिलखिलाती हुई
अपने प्रेमी से वफाओ के वादे लेती हुई
लेकिन वो मैं नहीं हूँ
मैं तो डूब गयी हूँ
उसी नदी में
फँस गयी हूँ
सैंकड़ो जलचर सांपो के मजबूत पाशो में
गला रुंधा हुआ है मेरा
मगर
मैं रो नहीं पा रही
काश!मुझे कोई रोने देता
काश!मुझे कोई रोने देता  

Sunday, 9 December 2012

"विद्रोह"

बहुत देर से चुपचाप बैठे हो तुम 
कहीं तुम घुट तो नहीं रहे 
तुम्हारा मन कोई मुल्क न हो जाये 
तुम्हारी आँखें  न देखने लगे नव-स्वप्न 
तुम्हारी जुबान न बोलने लगे नारे 
तुम्हारे हाथ न करने लगे आन्दोलन 
तुम्हारे पाँव न चलने लगे शिखर पर 
डरता  हूँ किसी नाकाम सरकार  की तरह
मैं भी तुम्हारे "विद्रोह" से

Sunday, 28 October 2012

कलम


सीँच के कागज को स्याही से जो लफ्जो को बोती है
देखो आज ये कलम बिचारी अपनी हालत पे रोती है
नौसिखीयो के हाथो मेँ आ शब्दो के संकर बन जाते
चट्टानी चेहरे विस्फोटो से पल मेँ कंकर बन जाते
रोजाना अब मंचो पर भाषा की हत्या होती है

गीत विरह के गजल प्यार की जाने क्या-क्या
लिखती ये
इसकी ताकत बहुत बडी है चाहे बौनी दिखती ये
मनु-उर की सीपी से निकले इसके आखर मोती है

शाम हो गई सुर्य ढल गया आशातीत था वो दिवस टल गया
चुल्हे मेँ तो आग नही थी सो लेखक का भाग्य जल गया
फिर भी उसने कलम को चुमा शायद यही कसौटी है

Monday, 26 December 2011

'राहरौ'

दिल मेँ दिल से दिल का कोई आह भरा अफसाना होगा
सुरत भले नयी हो फिर भी मेरा अक्स पुराना होगा
तीखी तेज दरो-दीवारेँ चीरेगी हरेक जिस्म
टीस होगी फस्ल की पर जख्म सालाना होगा
कूच करो अब इस दर से ये कस्बा कल वीराना होगा
बस्ती खंडहर हो जाएगी हर मंजर बेगाना होगा
तूफाँ होँगे अँधड होगा होगी बारिश कभी कहीँ
कुदरत का मुझे परखने को फिर कोई नया बहाना होगा
पहले पत्थर थे अब कांटे हैँ आगे राह भरी शोलो से
'राहरौ' जरा किस्मत से पुछो कब ये सफर सुहाना होगा

Saturday, 24 December 2011

रात जोगनिया कितना रोई

रात जोगनिया कितना रोई,रात जोगनिया कितना रोई
सहमी-2 रही चाँदनी, बादल संग लिपटी और सोई
नशा चढा नयनोँ मेँ दिनभर
कैसे संभले वो गिर गिरकर 
मन के वेद पुराण सब भीगे 
बची घुली कागज की लोई
रात जोगनिया कितना रोई,रात जोगनिया कितना रोई
जोगी का तो कन्धा भीगा
और जोगन की पूरी गोदी
आंगन भी इतना गीला था
के जैसे पूरी दुनिया रोई
रात जोगनिया कितना रोई,रात जोगनिया कितना रोई
कई दिनों से छिटक रही थी
दुःख की डोरी आखिर टूटी
उन आँखों से मोती बिखरे
इन हाथो ने माला पोई
रात जोगनिया कितना रोई,रात जोगनिया कितना रोई